वसीयत बनाने के नियम क्या हैं?
पांच दिन पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि पैतृक संपत्ति किसी को दान में नहीं दे सकते। इस संबंध में की गई वसीयत को भी फर्जी बताया गया। जरूरी नहीं है कि किसी ने मृत्यु से पूर्व अपनी वसीयत लिखी ही हो। यदि किसी ने वसीयत लिखी है, तो उसकी संपत्ति का बंटवारा उसकी इच्छा के अनुसार ही होगा। वसीयत करने में बहुत ज्यादा कानूनी लिखा-पढ़ी या नियमों का पेंच नहीं होता है। कोई भी व्यक्ति इसे लिखवा सकता है, लेकिन फिर भी कुछ नियम तो हैं ही, जिनका पालन करना होता है।
मृत्यु के पहले कोई भी मनुष्य या तो अपनी वसीयत बनाता है या नहीं। किसी व्यक्ति की मौत होती है तो जरूरी नहीं है कि उसने अपनी वसीयत लिखी ही हो। किसी ने अपनी वसीयत लिखी है तो उसकी संपत्ति का बंटवारा उसकी इच्छा के अनुसार ही होगा। उसकी संपत्ति से जैसा वह चाहता है, सभी को उतना ही हिस्सा मिलेगा। यदि किसी व्यक्ति ने अपना वसीयतनामा नहीं लिखा है और यदि वह ईसाई या पारसी है तो उसकी संपत्ति को भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम के तहत बांटा जाता है। इसी प्रकार यदि किसी हिंदू महिला या पुरुष की संपत्ति की बात हो और उसने वसीयत न लिखी हो तो उसे हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के तहत बांटा जाएगा। मुस्लिम होने पर उसे मुस्लिम कानून के मुताबिक संपत्ति मिल सकेगी। ज्यादा बेहतर स्थिति तो यही रहती है कि व्यक्ति को अपना वसीयतनामा लिख देना चाहिए। इससे स्थितियां ज्यादा सुस्पष्ट रहती हैं। साथ ही उसकी इच्छा के अनुसार संपत्ति का बंटवारा हो सकता है। कोई भी व्यक्ति अपने जीवन की किसी भी स्थिति में वसीयतनामा लिख सकता है। वसीयतनामे में एक बार नहीं कई बार परिवर्तन किया जा सकता है। यह कभी भी खत्म भी किया जा सकता है।
क्या हैं वसीयत बनाने के पैमाने
1. जो व्यक्ति स्वस्थ दिमाग का हो और वयस्क हो यानी उसकी आयु 18 साल से अधिक की हो, वह वसीयत स्वयं बना सकता है।
2. वसीयतनामा लिखने के लिए किसी भी स्टाम्प पेपर की जरूरत नहीं होती।
3. वसीयतनामा कानूनी और तकनीकी भाषा में हो यह जरूरी नहीं है। वसीयतनामा से लिखवाने वाले की मंशा जाहिर होती है कि किस तरह से वह अपनी मृत्यु के बाद अपनी संपत्ति का वितरण चाहता है। यदि वसीयत लिखवाने वाले की मंशा स्पष्ट है तो फिर कोई तकनीकी शब्द या व्याकरण की शुद्धता मायने नहीं रखती है।
4. इसकी वैधता के लिए इसे रजिस्टर्ड कराने की भी जरूरत नहीं होती है, फिर भी इसे रजिस्टर कराना बेहतर होगा।
5. जो व्यक्ति वसीयतनामा लिख रहा है उसे उस पर हस्ताक्षर करना होते हैं। इसमें दो गवाहों के प्रमाण भी लगते हैं, यानी उन्हें भी हस्ताक्षर करने होते हैं। इसका अर्थ यह है कि इस दस्तावेज में किए गए हस्ताक्षर सच में उसी व्यक्ति के हैं, जिसने वसीयतनामा बनाया या बनवाया है।
6. यदि किसी संपत्ति के मामले में एक से ज्यादा बार वसीयत लिखी गई है और वसीयतनामा लिखाने वाले की मृत्यु हो जाती है तो अंतिम बार जो वसीयतनामा लिखाया गया है वही सही माना जाएगा।
7. इसी प्रकार से यदि किसी वसीयत में एक से ज्यादा दो बार एक ही संपत्ति का विवरण और वह दो लोगों को दी गई है तो इसमें अंतिम नियम प्रभावी होगा।
8. वसीयतनामा इसे लिखाने वाले के शब्द माने जाते हैं।
9. यदि वसीयतनामा या इसका कोई हिस्सा जिसमें धोखाधड़ी प्रतीत होती है तो उसे बेकार मान लिया जाता है।
10. वसीयतनामा सशर्त भी हो सकता है। यह घटनाओं के होने या न होने पर बनाया जा सकता है। फिर भी यदि कोई हालात अवैध या अनैतिक है तो इसे निष्प्रभावी मान लिया जाता है। यदि किसी स्थिति में यह कानून के किसी प्रावधान के विपरीत है और नीतियों के खिलाफ है तो इस वसीयतनामे को अवैध मान लिया जाता है।
11. जिस व्यक्ति के नाम वसीयत लिखी गई है, यदि वह लिखवाने वाले के पहले ही चल बसता है तो ऐसे में वसीयतनामा निष्प्रभावी हो जाएगा। इसलिए यह सुझाव दिया जाता है कि एक की बजाय दो नाम वसीयतनामा में लिखाए जाएं। इसे इस उदाहरण से समझें- मेरे गुजर जाने के बाद संपत्ति रमेश के नाम की जाएं और यदि रमेश भी न रहे तो संपत्ति दिनेश को दें।
12. यदि वसीयतनामा में लिखी चीजें बदलें– उदाहरण के लिए यदि वसीयतनामा लिखने वाले ने दस्तावेज में सोने की अंगूठी लिखाई है और यदि यह अंगूठी चेन में तब्दील हो चुकी है तो इसकी वैधता सही नहीं मानी जाएगी। यह प्रभावशील नहीं मानी जाएगी।
13. कोडसिल यानी कोडपत्र यानी वसीयतनामा में कुछ जोड़ना या कुछ बदलाव करना होता है। कोडसिल से वास्तविक वसीयतनामा बदला जाता है। कोडसिल के जरिए ही वसीयतनामा लिखवाने वाला इसमें किसी का नाम जुड़वा पाता है या हटा लेता है। कोडसिल में वही सारी अनिवार्यताएं रहती हैं, जो वसीयतनामा में रहती हैं। कोडसिल को वास्तविक वसीयतनामा की तरह ही माना जाता है।
14. वसीयतनामा प्राधिकृत और अप्राधिकृत रहता है। अप्राधिकृत वसीयतनामा सामान्य लोगों द्वारा लिखवाया जाता है, जबकि प्राधिकृत वसीयतनामा, सैनिक, वायुसेवा और नौसेना में काम करने वाले लोग उस समय लिखवाते हैं, जिस समय ये लोग वास्तव में जंग जैसे हालात से रूबरू होते रहते हैं।
15. दो या दो से अधिक लोग भी संयुक्त वसीयतनामा लिख सकते हैं। यदि वसीयतनामा संयुक्त है और यदि लिखने वाले दोनों लोगों की मृत्यु के बाद प्रभावशील होना है तो इस प्रमाण-पत्र को किसी भी एक सदस्य के रहने तक नहीं सौंपा जा सकता। यहां तक कि दोनों में से कोई भी एक यह लिखा हुआ वसीयतनामा निरस्त भी कर सकता है।
16. दो या उससे अधिक लोग मिलकर एक परस्पर सहमति वाला वसीयतनामा लिखवा सकते हैं। इसमें वसीयत बनवाने वाले एक-दूसरे के नाम संपत्ति कर जाते हैं।
17. वसीयतनामा लिखवाने वाला एक एग्जीक्यूटर नियुक्त कर सकता है। यदि वसीयत में लिखा है कि बकाया वसूलना है, या कर्ज चुकाना है या प्रॉपर्टी की साज-संभाल की जाना है तो यह काम एग्जीक्यूटर/ एडमिनिस्ट्रेट करेगा। यदि वसीयत में एग्जीक्यूटर का नाम नहीं है तो एडमिनिस्ट्रेटर कोर्ट नियुक्त कर सकती है।
18. प्रोबेट (वसीयतनामा की सर्टिफाइड कॉफी) ही वसीयत का साक्ष्य होता है। प्रोबेट की एप्लीकेशन कोर्ट में की जाती है और कोई भी रिश्तेदार आपत्ति होने पर, उसे चुनौती दे सकता है। प्रोबेट के बारे में स्थानीय समाचार-पत्र में जानकारी देना जरूरी होती है।
19. वसीयतनामा लिखवाने वाले की मौत पर वसीयतनामा एग्जीक्यूटर या फिर कोई उत्तराधिकारी प्रोबेट की मांग कर सकता है। अदालत इस तरह के मामलों में उत्तराधिकारियों से पूछती है कि क्या उनको इस वसीयतनामे पर कोई आपत्ति है। यदि कोई आपत्ति नहीं रहती है तो अदालत उनको उक्त प्रोबेट सौंप देती है। प्रोबेट कोर्ट द्वारा प्रमाणित किया जाता है। प्रोबेट ही वसीयतनामा की प्रामाणिकता सिद्ध करता है। इसके बाद ही वसीयत प्रभावशील होती है।
फैक्ट- एक और सामान्य सिद्धांत यह है कि किसी भी व्यक्ति के वसीयतनामे में यदि कोई कमी है तो जहां तक ज्यादा से ज्यादा संभव हो कोर्ट उसे प्रभावी बनाने का प्रयास करेगी।
डॉ. सुनीता खारीवाल
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